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अनुशासन

गौरी तिवारी

सुबह आठ बजे आरव भारी बस्ता पीठ पर लटकाए विद्यालय जाने के लिए बस पकड़ने जा रहा था। उसकी चाल में किसी 10 वर्ष के बालक जैसी स्फूर्ति नहीं, अपितु किसी वृद्ध मजदूर की भांति थकावट थी। उसकी मां सुनीता पीछे से आवाज़ देते हुए कहती हैं – “जल्दी चलो, आज मैथ का टेस्ट भी है और फिर शाम को ट्यूशन भी।”
स्कूल बस लेट आने की वजह से उसे विद्यालय पहुंचते-पहुंचते देर हो जाती है, तभी प्रार्थना सभा शुरू होने की घंटी बजती है। वह घंटी की आवाज़ सुनते ही भयभीत हो जाता है, मानो उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। वह जैसे ही प्रार्थना सभा में पहुंचता है उसे अध्यापकों द्वारा एक अलग पंक्ति में खड़ा कर दिया जाता है। वह और उसके जैसे 9-10 विद्यार्थी और उस पंक्ति में खड़े होते हैं, सबके भीतर एक अजीब सा भय समाया होता है। जब प्रार्थना सभा समाप्त होती है तब उन सभी विद्यार्थियों को देर से आने का कारण बिना पूछे लकड़ी की बेंत से मारा जाता है, जिसके कारण एक विद्यार्थी का हाथ भी छिल जाता है।
विद्यालय में जितनी सख्ती विद्यार्थियों में अनुशासन लाने के लिए की जाती है उसका एक भाग भी पढ़ाई के लिए नहीं की जाती। कक्षा में अध्यापक रट्टू तोते जैसे सभी छात्र-छात्राओं को पाठ पढ़ा देते हैं लेकिन उन्हें जीवन से जोड़कर पाठ नहीं पढ़ाते जिसके कारण किसी भी विद्यार्थी को पाठ बेहतर ढंग से समझ में नहीं आता और ना ही अध्यापक बच्चों के मन में उठते प्रश्नों का हल बताते हैं। विद्यार्थियों को अनुशासित करने के लिए अपध्यापकों द्वारा कई नियम बनाए गए हैं, जैसे- कक्षा के दौरान प्रश्न पूछने पर उन्हें सजा देना, आपस में बात करने पर सजा देना, हर समस्या का समाधान सिर्फ सज़ा देना बन चुका था, टाइमटेबल से खेल का पीरियड हटाना, अन्य गतिविधियां रोक देना जैसे काव्यपाठ, भाषण या फिर अन्य आदि प्रतियोगिताएं बंद कर देना ताकि विद्यार्थियों का सारा ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर हो।
इसी कठोर अनुशासन में कुछ महीने बाद अचानक एक दिन विद्यालय में असामान्य हलचल थी। सुबह से ही अध्यापक, अध्यापिकाएं और सभी कर्मचारी इधर-उधर भाग रहे थे, अपने काम में व्यस्त थे। दीवारों पर नए चार्ट लगाए जा रहे थे, विद्यार्थियों की यूनिफॉर्म चेक की जा रही थी और बार-बार एक ही बात दोहराई जा रही थी- “निरीक्षण करने बड़े अफसर आ रहे हैं। कोई गलती नहीं होनी चाहिए।”
जो विद्यालय अपने कठोर अनुशासन के लिए प्रसिद्ध था, जहां हँसना भी धीमे और सवाल पूछना लगभग अपराध माना जाता था, खेल, संगीत, नाटक जैसी गतिविधियाँ महीनों पहले बंद की जा चुकी थीं, जहां बच्चों की दुनिया सिर्फ पुस्तकों और अंकों तक सीमित थी आज वहां एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन हो रहा था। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन से हुई जिसके पश्चात विद्यालय की प्रधानाचार्या महोदया डॉ. रेणुका मिश्रा तथा डिसिप्लीन कमिटी के प्रभारी श्री अरुण पाठक जी ने अपने वक्तव्य से कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। तदोपरांत निरीक्षण अधिकारी मंच पर पहुँचे। उन्होंने अपने सामने सैकड़ों विद्यार्थियों के चेहरे देखे, किंतु किसी एक के भी मुख पर आभा या चमक नहीं थी। सबके चेहरे उदास थे। उन्होंने अपना वक्तव्य प्रारंभ करने से पूर्व मैदान में बैठे सभी विद्यार्थियों से प्रश्न किया, “अच्छा बच्चों, बताइए आपको स्कूल में सबसे ज़्यादा क्या पसंद है?”
किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया। विद्यार्थियों की इस प्रतिक्रिया से प्रधानाचार्या जी की क्रोधित निगाहें बच्चों पर टिक गईं।
अफसर ने एक बार फिर पूछा,
“क्या आप में से किसी विद्यार्थी की रुचि गायन में है? कविता या संगीत कुछ भी?”
तभी अंतिम पंक्ति में खड़ी बारहवीं की एक छात्रा धीरे से अपना हाथ उठाती है किन्तु शिक्षकों को देखकर उनके भय से अपना हाथ नीचे कर लेती है। तभी निरीक्षण पर आए अफसर उसे देख लेते हैं और उसे मंच पर आमंत्रित करते हैं। इसपर उस छात्रा ने कहा ” सर मुझे पहले पसंद था गायन, अब मेरी रुचि नहीं है संगीत में।” तभी प्रधानाचार्या जी उसे आदेश देती हैं कि वह सर की बात मानकर जो भी आता है वह सुनाए। अगले ही क्षण वह धीमे स्वर में गाना प्रारंभ करती है – “बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़ुबाँ अब तक तेरी है”
जैसे ही यह ध्वनि माइक से मैदान में गूंजती है ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी ने बहुत समय से बंद खिड़की को खोलकर कमरे में रौशनी की हो।
बच्चों की थकी हुई उदास आंखों में एक नई चमक आ जाती है और वे अपने आप करतल ध्वनि से एक लय उत्पन्न करते हुए उसके साथ-साथ फैज़ अहमद फैज़ की ग़ज़ल की पंक्तियां पूर्ण करने लगते हैं- “तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है
देख कि आहन-गर की दुकाँ में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने
फैला हर इक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है
जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले”

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