अनकही कथा (कविता)
गौरी तिवारी ना अंत है इसका ना आरंभ है कोई कथा है वह अनकही जिसे सुनना चाह हर कोई वह चंद्र सा सुशोभित है वह रागिनी कोई दीवानी सी वह अनंत सा
गौरी तिवारी ना अंत है इसका ना आरंभ है कोई कथा है वह अनकही जिसे सुनना चाह हर कोई वह चंद्र सा सुशोभित है वह रागिनी कोई दीवानी सी वह अनंत सा
अनिल तिवारी "खूबसूरत रिवाज होता है प्रेम में, कभी न मिलने वालों की भी राहें देखी जाती है।" आजकल सामाजिक संचार माध्यम (सोशल मीडिया) के मंचों पर इन पंक्तियों को बार-बार दोहराया जा रहा
न बैठ यूं तू हार कर चल फिर से एक वार कर न रख तलवार को यूं म्यान में रख लक्ष्य को अपने ध्यान में बस तू चल दे तेरे निशान ज़मीं पे कुछ यूं
साहित्य की परंपरा में कुछ कृतियां ऐसी होती हैं जो मात्र किसी कथा का विस्तार नहीं करती अभी तो समझ में छपी पीड़ा विडंबना और प्रश्नों को उजागर करती हैं। ऐसे ही विचार उत्तेजक कृति
गौरी तिवारी चंदनिया छुप जाना रे, क्षण भर को लुक जाना रे निंदिया आँखों में आए, बिटिया मेरी सो जाए ले के गोद में सुलाऊँ, गाऊँ रात भर सुनाऊँ मैं लोरी-लोरी, हो, मैं लोरी-लोरी लोरी
गौरी तिवारी यह कथा है हिंदुस्तान की स्वाधीनता संग्राम की शहीदों का लहू है मिट्टी में यहां की ये गाथा है वीरों वीरांगनाओं की जहां राज्य हथियाने डलहौजी ने षड्यंत्र रचाया था वह मंगल
गोपालदास नीरज अमर उजाला (काव्य डेस्क) मैं सोच रहा हूँ अगर तीसरा युद्ध हुआ तो, इस नई सुबह की नई फसल का क्या होगा। मैं सोच रहा हूँ गर जमीं पर उगा खून, इस रंग
डॉ॰ अनिल कुमार सिंह प्राध्यापक,हिंदी विभाग आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यालय, दिल्ली विश्विद्यालय रोहतक से जींद वाली सड़क पर गोहाना से लगभग दो-तीन किलोमीटर आगे बाई ओर एक पतली सी सड़क निकलती है। यह
पिछली सदी बड़ी प्रतिभाओं के जन्म और कर्म की सदी थी, यह उनकी जयंतियों, पिंडदानों एवं कर्मकांडों की सदी है। वह गदरचियों के प्रतिकार का दौर था, यह विदोरचियों के प्रचार का दौर है, वह