साहित्य की आवश्यकता
साहित्य शब्द का यदि शाब्दिक अर्थ देखा जाए तो यह स+हित के योग से बनता है अर्थात हित के साथ, सबके हित के लिए। हिंदी साहित्य के विभिन्न आचार्यों ने साहित्य को लेकर अपने अपने
साहित्य शब्द का यदि शाब्दिक अर्थ देखा जाए तो यह स+हित के योग से बनता है अर्थात हित के साथ, सबके हित के लिए। हिंदी साहित्य के विभिन्न आचार्यों ने साहित्य को लेकर अपने अपने
गौरी तिवारी जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत एक विशाल जनसंख्या वाला देश है, और इस देश के गांव ही वह जड़ें हैं जिनसे शहर विकसित होते हैं। यहां का एक बहुत
गौरी तिवारी पुराना जख्म अभी भरा भी नहीं था कि फिर किसी के चीखने की आवाज आती है, बेल्ट कि वह धारियां जब शरीर पर लगती है तो ममता अपनी पूरी कोशिश करती है
अब यह मात्र कोई व्यथा नहीं, यह भीतर उठता प्रलय निनाद है मन रूपी ज्वालामुखी के गर्भ में सदियों से पलता हुआ यह प्रतिशोध अगाध है इस विश्व में रेखाएँ नहीं, जंजीरें खिंची हैं जहां
भूत की याद में भविष्य के इंतजार में वर्तमान को भूल मत वर्तमान को भूल मत समय ना कभी रुका है और ना कभी रुकेगा तू खुद पर हौसला रख तभी तो आगे बढ़ेगा समय
गौरी तिवारी जो विरह की वेदना से निकले वह अश्रु हूं मैं जो विरह के ताप से तपे वह क्रोध हूं मैं जो विरह के वेग से शांत हो जाए वह जल हूं मैं जो
गौरी तिवारी कोई भी व्यक्ति दोषरहित या एकदम सही नहीं होता, उसमें कोई न कोई कमी अवश्य होती है, किंतु कमियों के बावजूद वह किसी एक क्षेत्र में उत्तम होता है। मुझे भी यह
सड़क ने गाँव खाली कर दिए : विकास की राह पर छूटती मिट्टी की महक एक समय था जब अरुणोदय पक्षियों के कलरव से होता था, और शाम चूल्हे की आँच के साथ ढलती थीं।
प्रकृति का चमत्कार अरे गुड़िया उठ भी जाओ, स्कूल नहीं जाना क्या? देर हो रही है।" माधव पिछले 15 मिनट से अपनी बेटी को जगाने की कोशिश कर रहा था। आज इस नई जगह