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Author: KALRAV

KALRAV

साहित्य
मेरा संसार (कविता)

मेरा संसार (कविता)

गौरी तिवारी    तुम वह मधुर गीत हो  मेरे अंतर्मन की भावनाओं की  तुम वह पहली मंज़िल हो  मेरे इस कठिन जीवन सफर की  तुम वह शब्दों से परे भाव हो  मेरे हर प्रिय काव्य

साहित्य
कलरव, सितम्बर 2007

कलरव, सितम्बर 2007

कलरव सितम्बर 2007   मासिक पत्रिका कलरव, वर्ष 2007 के सितम्बर माह का अंक।

साहित्य
मानवता परमो धर्मः (लघुकथा)

मानवता परमो धर्मः (लघुकथा)

गौरी तिवारी शाम में ही काले बादलों ने आकाश को रजनी की चादर ओढ़ा दी, आखिर इतनी तेज़ बारिश जो हो रही थी। कम होने की जगह लगातार तेज़ होती जा रही थी। एक ओर

देश-दुनिया
पश्चिम बंगाल चुनाव: किधर ठहरेगी की नाव !

पश्चिम बंगाल चुनाव: किधर ठहरेगी की नाव !

खिलेगा कमल या जोड़ा फूल का जलवा रहेगा बरकरार? ------ अनिल तिवारी ------- पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी के चुनावी दंगल में हार जीत का नतीजा कल (4 मई 2026) आएगा।

साहित्य
कलरव पत्रिका, अक्टूबर 2025

कलरव पत्रिका, अक्टूबर 2025

Kalarav-October-2025.pdf   कलरव पत्रिका के वर्ष 2025 का अक्टूबर माह का अंक।

साहित्य
कलरव पत्रिका, जून-जुलाई 2007

कलरव पत्रिका, जून-जुलाई 2007

kalrav-june-july-2007.pdf कलरव पत्रिका, वर्ष 2007 के जून-जुलाई माह का अंक।

साहित्य
लघुकथा: एक लंबी यात्रा

लघुकथा: एक लंबी यात्रा

अनिल तिवारी मौजूदा दौर युवा जोश, उसकी ई-तकनीक, मेधाशक्ति आदि के घोल से सब कुछ पलक झपकते हासिल कर लेने के जुनून का है। इसका असर जीवन के हर क्षेत्रों की तरह साहित्य में भी

विचार
मजदूर दिवस विशेष

मजदूर दिवस विशेष

फिर गुलामी जैसी स्थिति में फंसता जा रहा मजदूर ----- अनिल तिवारी ------- शोषण के खिलाफ लंबे अरसे से ओढ़ रखी चुप्पी तोड़कर कामगार जब एनसीआर की सड़कों पर बगावत का झंडा लेकर उतरे तो

देश-दुनिया
जस की तस है, कामगारों की दशा

जस की तस है, कामगारों की दशा

यह वक्त है आत्म समीक्षा का ---------- अनिल तिवारी ------- पिछले 140 वर्षों में दुनिया के साथ भारत में भी संगठित क्षेत्र के मजदूरों की सेवा शर्तों में काफी हद तक सुधार हुआ है। इससे

साहित्य
मजदूर दिवस के अवसर पर गोरख पांडेय की कविता

मजदूर दिवस के अवसर पर गोरख पांडेय की कविता

कहब तऽ लाग जाई धक् से, धक् से कहब तऽ लाग जाई धक् से बड़े-बड़े लोगन के बंगला दो बंगला अउर भईया झूमर अलग से कहब तऽ लाग जाई धक् से हमरे गरीबन के झोपड़ी जुलुम्बा